Monday, 24 April 2017

माँ-बाप और पैसा

माँ-बाप और पैसा

संदर्भ :- प्रस्तुत कविता दुर्ग के एक वृद्धा आश्रम के दौरे से प्रेरित होकर लिखी है। जहॉ एक बूढ़ी माँ ने मुझे अपने परिवार की संपन्नता बारे में बताया। आशा है कि आपको पसंद आए। एक माँ अपने पुत्र से क्या कहती है पढ़िए गा 

कविता :-
मेरे बेटे तूने पैसा खूब कमाया पर
तेरा यह पैसा किसी काम नहीं आया

जो तू अपनी पालनहार को पाल नहीं पाया
अपने मां-बाप को तू आश्रम छोड़ आया

मैंने अपनी उदर में तुझे पनाह दी थी तू मुझे एक छत तक नसीब नहीं करा पाया

जिस पिता ने उंगली पकड़ तुझे चलना सिखाया
तू उसके बुढ़ापे की लाठी तक ना बन पाया

तेरी भूख पर अपना निवाला भूल कर मैंने तुझे खाना खिलाया
तु मुझे दो वक्त की रोटी तक ना नसीब करा पाया

तेरा शौक पूरा करने जिस पिता ने कर्ज लेकर तुझ पर लाखो खर्च किए तू उसके दवा का बिल भी चुकाना पाया

धूप में जिस आंचल की छाव ली थी तूने
उस आंचल से तूने उसका घर भी छुड़वाया

जिस पिता के कंधे पर तू ने दुनिया देखी थी
तू उसे दवाखाने तक मैं ले जाना पाया

तेरी हर चोट से निकले खून देख जीन के आंसू आ जाया करते थे
तूने उन्हें बुढ़ापे में खून के आंसू रुलाया

मेरे बेटे तूने पैसा खूब कमाया पर
तेरा यह पैसा किसी काम नहीं आया

✍🏻 हर्ष लाहोटी (बस्तर) 9589333342

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